नेतन्याहू को हिटलर कहना क्या सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी है

नेतन्याहू को हिटलर कहना क्या सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी है

तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की तुलना एडॉल्फ हिटलर से कर दी। इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भूचाल ला दिया है। एर्दोगन ने साफ कहा कि गाजा में जो कुछ भी हो रहा है, वह किसी नरसंहार से कम नहीं है और इसके लिए सीधे तौर पर नेतन्याहू जिम्मेदार हैं। उन्होंने दावा किया कि नेतन्याहू के तरीके देखकर हिटलर को भी जलन होने लगेगी। यह कोई पहली बार नहीं है जब दोनों देशों के बीच इस तरह के तीखे शब्दों के बाण चले हैं। लेकिन इस बार का तनाव पुराना रिकॉर्ड तोड़ रहा है।

इजरायल ने भी इस हमले का तुरंत और कड़ा जवाब दिया। नेतन्याहू ने पलटवार करते हुए कहा कि एर्दोगन को नैतिकता पर भाषण देने का कोई हक नहीं है। उन्होंने तुर्की पर कुर्दों के दमन और पत्रकारों को जेल में डालने का आरोप मढ़ दिया। यह जुबानी जंग सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं है बल्कि इसके पीछे मिडिल ईस्ट की गहरी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं छिपी हैं।

शब्दों की जंग के पीछे का असली खेल

दोनों नेताओं के बीच का यह विवाद सिर्फ आज की पैदाइश नहीं है। तुर्की और इजरायल के रिश्ते सालों से उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं। कुछ समय पहले दोनों देशों ने अपने राजनयिक संबंधों को सुधारने की कोशिश की थी। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान दोनों नेताओं ने मुलाकात भी की थी। लेकिन गाजा संकट शुरू होते ही वह सारी कोशिशें पानी में मिल गईं।

एर्दोगन खुद को मुस्लिम जगत का सबसे बड़ा नेता साबित करना चाहते हैं। गाजा के मुद्दे पर खुलकर बोलना उनकी घरेलू राजनीति के लिए भी बहुत फायदेमंद साबित होता है। तुर्की के भीतर फिलिस्तीन के समर्थन में भारी जनभावना है। एर्दोगन इसी जनभावना का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए करते हैं। जब वे नेतन्याहू को आज का नाजी कहते हैं तो वे सीधे तौर पर अपने देश के रूढ़िवादी और राष्ट्रवादी वोट बैंक को साध रहे होते हैं।

दूसरी तरफ इजरायल इस बात से बेहद नाराज है कि तुर्की हमास को एक आतंकवादी संगठन नहीं मानता। एर्दोगन हमास को एक मुक्ति संगठन या प्रतिरोध समूह के रूप में देखते हैं। इजरायल के लिए यह रुख किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं है।

इजरायल का पलटवार और इतिहास का हवाला

इजरायली राष्ट्रपति आइजैक हर्ज़ोग और युद्ध कैबिनेट के अन्य सदस्यों ने भी एर्दोगन के इस बयान की कड़ी निंदा की। इजरायल का तर्क है कि हिटलर के नरसंहार (होलोकॉस्ट) की तुलना दुनिया के किसी भी अन्य संघर्ष से नहीं की जा सकती। होलोकॉस्ट में लाखों यहूदियों को योजनाबद्ध तरीके से मारा गया था। इजरायल का कहना है कि एर्दोगन का यह बयान उस भयानक इतिहास का अपमान करता है।

बेंजामिन नेतन्याहू ने तुर्की के आंतरिक मामलों को उछालकर एर्दोगन को घेरने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपने ही देश में आलोचकों और पत्रकारों की आवाज दबाता है, वह दुनिया की सबसे नैतिक सेना (आईडीएफ) पर उंगली नहीं उठा सकता। इजरायल लगातार यह दावा करता आया है कि उसकी लड़ाई गाजा के आम नागरिकों से नहीं बल्कि हमास से है।

सिर्फ बयानबाजी या व्यापार पर भी असर

हैरानी की बात यह है कि इस भारी तनाव के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार पूरी तरह बंद नहीं हुआ था। हालांकि हाल के दिनों में तुर्की ने इजरायल के साथ अपने आयात और निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। यह कदम दिखाता है कि बात अब सिर्फ बयानों से आगे निकलकर आर्थिक मोर्चे पर आ चुकी है। व्यापारिक संबंध टूटने से दोनों देशों के व्यापारियों को भारी नुकसान हो रहा है।

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तुर्की ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीएच) में इजरायल के खिलाफ चल रहे नरसंहार के मामले का भी समर्थन किया है। दक्षिण अफ्रीका द्वारा लाए गए इस मामले में तुर्की खुलकर इजरायल के विरोध में खड़ा है। इससे साफ है कि एर्दोगन इस लड़ाई को हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाना चाहते हैं।

इस कूटनीतिक तनाव का भविष्य क्या है

मिडिल ईस्ट की राजनीति में कोई भी रिश्ता स्थाई नहीं होता। आज जो कट्टर दुश्मन दिख रहे हैं, वे कल फिर से हाथ मिला सकते हैं। लेकिन नेतन्याहू और एर्दोगन के व्यक्तिगत टकराव ने इस बार रिश्तों को बहुत गहरा जख्म दिया है। जब तक गाजा में पूरी तरह से युद्धविराम नहीं होता और कोई स्थाई समाधान नहीं निकलता, तब तक तुर्की और इजरायल के बीच सामान्य संबंधों की उम्मीद करना बेकार है। दोनों ही नेता अपनी-अपनी घरेलू राजनीति के दबाव में हैं और कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस पूरी उठापटक को बेहद करीब से देख रहा है क्योंकि इसका असर पूरे क्षेत्र की स्थिरता पर पड़ रहा है।

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Leah Liu

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