बुढ़ापे में खराब सेहत के लिए हम खुद कितने जिम्मेदार हैं

बुढ़ापे में खराब सेहत के लिए हम खुद कितने जिम्मेदार हैं

एक कड़वा सच सुनिए। साठ की उम्र पार करते ही जब घुटने जवाब देने लगते हैं या ब्लड प्रेशर की दवाइयां लाइफ का हिस्सा बन जाती हैं, तो हम अक्सर किस्मत या बढ़ती उम्र को दोष देते हैं। पर असलियत कुछ और है। हालिया ग्लोबल हेल्थ रिपोर्ट्स और बुजुर्गों की जीवनशैली पर हुए अध्ययन बताते हैं कि बुढ़ापे की लगभग 80 प्रतिशत बीमारियों के जिम्मेदार हम खुद होते हैं। यह हमारी जवानी की गलतियां हैं जो बाद में भारी पड़ती हैं।

शरीर कोई मशीन नहीं है जो अचानक एक दिन खराब हो जाए। यह एक बैंक अकाउंट की तरह है। आप आज जो इसमें डाल रहे हैं, बुढ़ापे में वही ब्याज के साथ वापस मिलेगा। खराब खानपान, सुस्त दिनचर्या और लगातार तनाव। यही वो चीजें हैं जो हमें समय से पहले बूढ़ा बना रही हैं। Meanwhile, you can explore similar events here: Why the Bundibugyo Ebola Outbreak is Slipping Out of Control.

लोग अक्सर सोचते हैं कि रिटायरमेंट के बाद सेहत संभाल लेंगे। यह सबसे बड़ी गलतफहमी है। सेहत सुधारने का कोई फिक्स टाइम नहीं होता। अगर आप आज तीस या चालीस साल के हैं, तो आपका बुढ़ापा अभी से तय हो रहा है।

लाइफस्टाइल की वो गलतियां जो बाद में भारी पड़ती हैं

हम रोज ऐसी कई छोटी-छोटी गलतियां करते हैं जिन्हें हम सामान्य मानते हैं। लेकिन लंबे समय में ये गलतियां जानलेवा साबित होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़े भी यही कहते हैं कि गैर-संचारी रोग (NCDs) जैसे दिल की बीमारी, डायबिटीज और कैंसर दुनिया भर में होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण हैं। इनमें से ज्यादातर बीमारियां सीधे हमारी आदतों से जुड़ी हैं। To explore the bigger picture, check out the recent analysis by National Institutes of Health.

सबसे बड़ी समस्या है फिजिकल इनएक्टिविटी। हममें से ज्यादातर लोग दिनभर कुर्सी पर बैठे रहते हैं। स्क्रीन के सामने घंटों बिताना हमारी मजबूरी बन चुका है। पैदल चलना तो जैसे हम भूल ही गए हैं। जब शरीर हिलेगा-डुलेगा नहीं, तो उसकी क्षमता कम होना तय है। मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं और जोड़ों का लचीलापन खत्म होने लगता है।

दूसरा बड़ा विलेन है हमारा खाना। पैकेटबंद फूड, ज्यादा नमक, रिफाइंड शुगर और अनहेल्दी फैट। यह सब स्वाद में तो अच्छे लगते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर धमनियों को ब्लॉक करते हैं। लोग सोचते हैं कि थोड़ा सा जंक फूड खाने से क्या होगा। रोज का यही 'थोड़ा सा' बुढ़ापे में गंभीर बीमारियों का रूप ले लेता है।

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तनाव को तो हम अपनी जिंदगी का हिस्सा मान चुके हैं। 'काम का प्रेशर है', 'लाइफ में स्ट्रगल है'—ये बहाने अब आम हैं। लेकिन क्रॉनिक स्ट्रेस यानी लंबे समय तक रहने वाला तनाव शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ा देता है। यह हार्मोन धीरे-धीरे दिल और दिमाग दोनों को खोखला करता है।

क्या वाकई उम्र बढ़ना ही बीमारी की जड़ है

बिल्कुल नहीं। उम्र बढ़ना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन बीमार होना नहीं। आपने अपने आस-पास कुछ ऐसे बुजुर्गों को जरूर देखा होगा जो सत्तर की उम्र में भी सुबह पार्क में दौड़ते हैं। वहीं कुछ लोग पचास की उम्र में ही लाठी टेकने लगते हैं। दोनों में केवल एक ही अंतर है—उनकी जीवनशैली।

हार्वर्ड टी.एच. चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की एक मशहूर स्टडी बताती है कि अगर कोई व्यक्ति पांच स्वस्थ आदतें अपना ले—स्वस्थ डाइट, नियमित एक्सरसाइज, सही वजन, शराब से दूरी और नो स्मोकिंग—तो वह अपनी जिंदगी के बहुमूल्य साल बढ़ा सकता है। इतना ही नहीं, वह बुढ़ापे में भी बिना किसी गंभीर बीमारी के जी सकता है।

आदत शरीर पर सीधा असर
रोज 30 मिनट वॉक दिल मजबूत रहता है, जोड़ों का दर्द दूर होता है
चीनी और मैदा बंद डायबिटीज और मोटापे से बचाव
7 घंटे की गहरी नींद मानसिक संतुलन और बेहतर इम्युनिटी
पर्याप्त पानी पीना किडनी और स्किन के लिए संजीवनी

इसे जेनेटिक्स का खेल कहना बंद कीजिए। हां, कुछ बीमारियां आनुवंशिक होती हैं। लेकिन आपकी आदतें उन जींस को ट्रिगर करने या दबाने की ताकत रखती हैं। अगर आपके परिवार में किसी को डायबिटीज है, तो इसका मतलब यह नहीं कि आपको भी होगी ही। आपकी खराब आदतें उस खतरे को बढ़ा देती हैं।

मानसिक सेहत को नजरअंदाज करने की भारी कीमत

जब हम स्वास्थ्य की बात करते हैं, तो अक्सर केवल शरीर पर ध्यान देते हैं। मन को तो जैसे हम भूल ही जाते हैं। अकेलेपन और डिप्रेशन का बुढ़ापे की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ता है।

आजकल की न्यूक्लियर फैमिली और काम की व्यस्तता के कारण बुजुर्ग अक्सर अकेले रह जाते हैं। सामाजिक रूप से कटे रहने के कारण दिमाग सुस्त होने लगता है। डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी दिमागी बीमारियां इसी वजह से तेजी से बढ़ रही हैं। मानसिक रूप से सक्रिय रहना उतना ही जरूरी है जितना शारीरिक रूप से। किताबें पढ़ना, सुडोकू हल करना या नए लोगों से बात करना दिमाग को बूढ़ा होने से रोकता है।

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अब क्या किया जाए

गलतियां तो समझ आ गईं, लेकिन समाधान क्या है? अच्छी बात यह है कि शरीर को सुधारने की शुरुआत कभी भी की जा सकती है। अगर आप आज से ही छोटे बदलाव करेंगे, तो पांच-दस साल बाद आपका शरीर आपको धन्यवाद देगा।

  • खोजिए अपनी फिजिकल एक्टिविटी: जिम जाना जरूरी नहीं है। बस रोज 30 से 45 मिनट तेज कदमों से चलिए। लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल कीजिए। शाम को वॉक पर निकलिए।
  • रसोई को बदलिए: घर का बना सादा खाना सबसे बेस्ट है। अपनी थाली में हरी सब्जियां, सलाद, दालें और मोटे अनाज जैसे बाजरा या रागी को शामिल कीजिए। प्रोसेस्ड फूड को पूरी तरह टाटा कह दीजिए।
  • स्क्रीन टाइम घटाइए: सोने से कम से कम एक घंटा पहले फोन को खुद से दूर कर दीजिए। अधूरी और खराब नींद आधे से ज्यादा बीमारियों की जड़ है। शरीर को रिपेयर होने का समय दीजिए।
  • सोशल सर्कल बनाइए: अकेले मत रहिए। दोस्तों से मिलिए, पुराने रिश्तेदारों से फोन पर बात कीजिए या किसी सोशल ग्रुप का हिस्सा बनिए। खुश रहने वाले लोग ज्यादा जीते हैं।

बुढ़ापे को लाचारी का पर्याय मत बनाइए। यह आपकी जिंदगी का वो दौर होना चाहिए जहां आप अपनी पूरी जिंदगी की कमाई और अनुभवों का आनंद ले सकें। घुटनों के दर्द या दवाइयों के डिब्बे के सहारे जीना कोई जीना नहीं है। आज आप जो चुनेंगे, कल वही आपकी हकीकत बनेगा। अपनी सेहत की जिम्मेदारी खुद लेना शुरू कीजिए, क्योंकि आपकी बॉडी के प्राइम मिनिस्टर आप खुद हैं।

JR

John Reed

Drawing on years of industry experience, John Reed provides thoughtful commentary and well-sourced reporting on the issues that shape our world.